संस्कृति

सम्पन्न हुई दशगी हातड़ क्षेत्र के आराध्य भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की पौराणिक आषाढ़ी जात्रा एवं ऐतिहासिक दिरयाणा मेला

Vivek Bisht · 01 जुल. 2026, 11:04 AM · 129 व्यूज़

सम्पन्न हुई दशगी हातड़ क्षेत्र के आराध्य भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की पौराणिक आषाढ़ी जात्रा एवं ऐतिहासिक दिरयाणा मेला
उत्तरकाशी | पहाड़ की आवाज़ न्यूज़
उत्तरकाशी जनपद के दशगी हातड़ क्षेत्र के आराध्य एवं मुलुकपति भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की पावन आषाढ़ी जात्रा एवं ऐतिहासिक दिरयाणा मेला श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर क्षेत्रभर से हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दिरयाणा मंदिर पहुंचे।
एक वर्ष बाद भक्तों को दिए दर्शन
29 जून 2026 को प्रातः लगभग 9 बजे भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव अपनी वार्षिक आषाढ़ी जात्रा के तहत पुजार गांव स्थित मूल थान से बाहर पधारे। इसके बाद देव डोली अपने मैती गांव कपराड़ा पहुँची, जहाँ ग्रामीणों ने ढोल-दमाऊं, फूल-मालाओं और जयघोष के साथ अपने आराध्य का भव्य स्वागत किया। इस दौरान भगवान ने अपने मूल जलकुंड में स्नान किया तथा श्रद्धालुओं ने हरियाली अर्पित कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त किया।
दिरयाणा मंदिर में हुआ पहला रात्रि विश्राम
सायंकाल देव डोली अपनी वार्षिक जात्रा के प्रथम पड़ाव प्राचीन दिरयाणा मंदिर पहुँची। वैदिक मंत्रोच्चार और संध्याकालीन आरती के बीच भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव अपनी स्वयंभू मूल पिंडी में विराजमान हुए। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और क्षेत्रवासियों की गहरी आस्था का केंद्र मानी जाती है।
वर्ष में केवल एक बार निकलती है दुर्लभ ढाल जात्रा
30 जून 2026 को दिरयाणा मंदिर परिसर में भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की ऐतिहासिक एवं दुर्लभ ढाल जात्रा आयोजित की गई। वर्ष में केवल एक बार भगवान की मूल विग्रह खुले आकाश के नीचे अपने भक्तों को दर्शन देती है। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की।
स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी है अद्भुत मान्यता
दिरयाणा मंदिर का इतिहास कई सदियों पुराना माना जाता है। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग (उपजी हुई पिंडी) को किसी मानव द्वारा स्थापित नहीं माना जाता, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ शिवलिंग है। दशगी हातड़ बिष्ट क्षेत्र में यह अपनी तरह का एकमात्र स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार, एक समय एक गाय प्रतिदिन स्वयं इस पवित्र शिवलिंग पर अपना दूध अर्पित करती थी। जब एक ग्रामीण ने अज्ञानवश कुल्हाड़ी से पिंडी को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया, तो उसके पूरे वंश के नष्ट होने की कथा आज भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित है। इसी घटना के बाद भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की महिमा दूर-दूर तक प्रसिद्ध हुई और इस ऐतिहासिक जात्रा एवं मेले की परंपरा शुरू हुई।
आस्था, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम
भगवान श्री सिद्धेश्वर महादेव की आषाढ़ी जात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तरकाशी की प्राचीन लोकसंस्कृति, देव परंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस पावन आयोजन में शामिल होकर अपने आराध्य के दर्शन करते हैं और क्षेत्र की खुशहाली की कामना करते हैं।
जय श्री सिद्धेश्वर महादेव। 🚩🔱

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